ईरान की कम्युनिस्ट पार्टी, जिसे तुदेह पार्टी के नाम से जाना जाता है, उसकी स्थापना 1941 में हुई थी। दशकों तक यह ईरान की सबसे महत्वपूर्ण कम्युनिस्ट राजनीतिक शक्ति रही। श्रमिक आंदोलनों, छात्र राजनीति और बौद्धिक समाज—हर क्षेत्र में इनका प्रभाव गहरा था। शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासनकाल में इस पार्टी को भयानक दमन का सामना करना पड़ा; कई नेता और कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए, प्रताड़ित किए गए, निर्वासित किए गए या मारे गए। इसके परिणामस्वरूप, तुदेह पार्टी की राजनीतिक चेतना के केंद्र में केवल एक ही लक्ष्य था—शाह का पतन।
1978-79 में जब शाह-विरोधी जन विद्रोह अपने चरम पर था, तब तुदेह पार्टी सक्रिय रूप से उसमें शामिल हुई। श्रमिक हड़तालें, छात्र आंदोलन और सड़कों पर जुलूस—वे हर जगह मौजूद थे। लेकिन इस मोड़ पर उन्होंने एक गंभीर राजनीतिक गलती की।
तुदेह पार्टी के नेतृत्व ने अयातुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व वाले इस्लामवादी आंदोलन को एक अस्थायी, जन-आधारित और साम्राज्यवाद-विरोधी शक्ति के रूप में देखा।
उनका मानना था कि पहले चरण में शाह और अमेरिकी प्रभाव का अंत होगा, जिसके बाद धीरे-धीरे वामपंथी और समाजवादी ताकतें राजनीति का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेंगी।
इसी तर्क के आधार पर उन्होंने खुमैनी और इस्लामी नेतृत्व का खुलेआम समर्थन किया। इस्लामी गणराज्य की स्थापना के शुरुआती दौर में उन्होंने न केवल विरोध नहीं किया, बल्कि कई मामलों में मूक सहयोग भी दिया।
क्रांति के बाद के पहले दो-तीन वर्षों में तुदेह पार्टी को लगा कि वे सुरक्षित हैं। उन्होंने नए संविधान के बुनियादी ढांचे पर सवाल नहीं उठाए और न ही धार्मिक शासन के खिलाफ खुलकर खड़े हुए। लेकिन इस्लामी गणराज्य की दृष्टि में तुदेह पार्टी ‘नास्तिक’ थी, अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन का हिस्सा थी और धार्मिक राज्य व्यवस्था के लिए एक मौलिक खतरा थी। संक्षेप में, शाह को उखाड़ फेंकने के लिए उनकी आवश्यकता थी; राज्य के मजबूत होने के बाद उनकी कोई जरूरत नहीं रही।
1982 से तुदेह पार्टी का पूर्ण विनाश शुरू हुआ। पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया गया, शीर्ष नेताओं को एक साथ गिरफ्तार किया गया और हजारों कार्यकर्ताओं को जेलों में डाल दिया गया। ईरानी सरकारी टेलीविजन पर तुदेह नेताओं से जबरन “इकबालिया
बयान” दिलवाए गए—जहाँ उन्हें खुद को सोवियत जासूस और इस्लाम का दुश्मन स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया। यह राजनीतिक अपमान के साथ-साथ एक नैतिक हत्या भी थी। जेलों में यातना के कारण कई नेताओं की मौत हो गई, कइयों को मौत की सजा दी गई और बाकी लोग वर्षों तक अमानवीय परिस्थितियों में कैद रहे।
इस दमनकारी नीति का सबसे क्रूर रूप 1988 के सामूहिक फाँसी के दौरान देखा गया। उस समय तुदेह पार्टी के अनगिनत कार्यकर्ता—जो पहले से ही सजायाफ्ता कैदी थे—उन्हें गुप्त रूप से फाँसी पर लटका कर मार दिया गया। उनके परिवारों को
सूचित नहीं किया गया और उनकी कब्रों का भी पता नहीं दिया गया। जो जीवित बचे, उनमें से अधिकांश को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। यूरोप और सोवियत संघ में निर्वासन में जाकर तुदेह पार्टी व्यावहारिक रूप से केवल एक ‘स्मृति संगठन’ बनकर रह गई। ईरान के भीतर पार्टी का नाम लेना भी अपराध बन गया।
तुदेह पार्टी का इतिहास केवल एक पार्टी के पतन का इतिहास नहीं है; यह एक गहरे राजनीतिक सबक का दस्तावेज है। उन्होंने शाह के खिलाफ साहस के साथ लड़ाई लड़ी थी, लेकिन धार्मिक सत्तावाद का विश्लेषण करने में वे चूक गए। उन्होंने सोचा था कि एक वैचारिक एकता बनेगी, जबकि वास्तव में सत्ता पर एकाधिकार स्थापित हो गया। इस गलती की कीमत उन्हें अपने संगठन, अपने लोगों और अंततः अपने इतिहास से चुकानी पड़ी।
ईरान की क्रांति ने दिखाया है कि जो क्रांति लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की नींव पर नहीं बनी होती, वहाँ अंततः सबसे संगठित कट्टरपंथी ताकत ही अन्य सभी आवाजों को खामोश कर देती है। तुदेह पार्टी उसी निर्मम सत्य का प्रमाण है।
(कुलदा राय (बांग्ला) की फेसबुक पोस्ट से साभार। अनुवाद : शतंजित घोष।)